दुनिया को बचाने का अंतिम तरीका

जिस तरह से दुनिया भागी जा रही है . इसे बचने का अंतिम तरीका क्या हो सकता है. ज्ञान इतना बढ़ रहा है. कि मनुष्य पैदा होगा और सिर्फ ज्ञान ही लेता रहेगा और ज्ञान  बढ़ता चला  जायेगा.

अब इसका क्या असर हो रहा है. यह देखने के लिए हम एक जीवन देखते हैं.

एक मेट्रो शहर मैं रहने वाला एक व्यक्ति सुबह ८ बजे उठकर ऑफिस जाता है. ऑफिस मैं टेंशन भरी लाइफ जीता है. इस के साथ उसे अपने जीवन में नौकरी करने के लिए रोज़ एक नयी बात सीखनी पड़ती है.

कोई पेन ड्राइव बनी पड़ेगी जो कि सारा सब्जेक्ट उसके दिमाग मैं फिट करते ही सारा नॉलेज उसके दिमाग मैं चला जाए.

और एक मोबाइल और सिम कार्ड भी फिट करना होगा. समय नहीं है उसके पास कि इतना सब कैर्री करना पड़े.

 

सम्पति क्या है .

मैंने रबोर्ट टी कियोसकी की बुक पढ़ी जिससे पता चला सम्पति क्या है. इस का कैसे उपयोग करैं. इस किताब मैं बहुत अच्छे से बताया गया है की अपने पैसे का कैसे उपयोग करें.

 

इस किताब का नाम है पूर डैड रिच डैड जो आपको आसानी से हिंदी और अंग्रेजी मैं अमेज़न और फ्लिप्कार्ट मैं मिल जाएगी.  दाम है १७० रूपये. एक बार ये बुक जरूर पढना.

किस तरह रोबर्ट ने अपने दो बाप बनाये और उनसे प्रेरणा ली और दोनों बाप ने उन्हें क्या सिखाया.

भाषा और मौन की परिभाषा.

भाषा क्या है.

इसे मैं आपको कुछ एस प्रकार समझाता हूँ. जैसे सामने कोई जापानीस आ जाये और वो कुछ बोलने लगे तो हम नहीं समझ सकते हैं. जिस प्रकार अगर कोई हिंदी बोलने वाला हमारे पास आ जाये  हमे समझ आता है. इसे भाषा कहते हैं.

अब मैं आपको अपने शब्दों मैं मौन का अर्थ बताता हूँ.

समझ लो हमारा दिमाग एक कंप्यूटर है. और एक कंप्यूटर सिर्फ जीरो और वन की भाषा समझता है. ऐसे ही कंप्यूटर मैं दो प्रकार की लैंग्वेज होती है. high लेवल प्रोग्रामिंग और लो लेवल प्रोग्रामिंग. ये दोनों प्रोग्रामिंग ही हमे स्क्रीन पर आउटपुट बताता है.

लो  लेवल प्रोग्रामिंग वो भाषा है जिसे हम आम बातचीत मैं इस्तेमाल करते हैं. और हाई लेवल पोर्ग्रम्मिंग वो भाषा है. जिसे हम समझते हैं. और अपने दिमाग को सही और गलत का फैसला लेने के लिए छोड़ देते है. दिमाग उसे समझता है और हमे सही और गलत का फैसला देता है.

अगर हम मों रहते हैं. तो दिमाग उसे अच्छे से समझ सकता है. इसलिए एक शिक्षक अपनी कक्षा मैं मौन रहने को कहता है. ताकि मन उसे अच्छे से समझ सके.

आगे मैं अपने ब्लॉग मैं कुछ नया लिखूंगा एस सम्बन्ध मे.

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ :
कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती. कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो.
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धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ :
मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है. अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा !
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तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ :
कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है. यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !
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साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

अर्थ :
इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे.
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पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ :
बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके. कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा.
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बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ :
जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है.
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मिरेकल

Jai uttrakhand. …गोपीनाथ मंदिर…
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गोपीनाथ मंदिर उत्तराखण्ड राज्य के चमोली जिले के गोपेश्वर में स्थित है। गोपीनाथ मंदिर गोपेश्वर ग्राम में है जो अब गोपेश्वर कस्बे का भाग है।गोपीनाथ मंदिर एक प्राचीन मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर अपने वास्तु के कारण अलग से पहचाना जाता है; इसका एक शीर्ष गुम्बद और 30 वर्ग फुट का गर्भगृह है, जिस तक 24द्वारों से पहुँचा जा सकता है।

मंदिर के आसपास टूटी हुई मूर्तियों के अवशेष इस बात का संकेत करते हैं कि प्राचीन समय में यहाँ अन्य भी बहुत से मंदिर थे। मंदिर के आंगन में एक 5 मीटर ऊँचा त्रिशूल है, जो 12 वीं शताब्दी का है और अष्ट धातु का बना है। इस पर नेपाल के राजा अनेकमल्ल, जो 13 वीं शताब्दी में यहाँ शासन करता था, का गुणगान करते अभिलेख हैं। उत्तरकाल में देवनागरी में लिखे चार अभिलेखों में से तीन की गूढ़लिपि का पढ़ा जाना शेष है।

दन्तकथा है कि जब भगवान शिव ने कामदेव को मारने के लिए अपना त्रिशूल फेंका तो वह यहाँ गढ़ गया। त्रिशूल की धातु अभी भी सही स्थित में है जिस पर मौसम प्रभावहीन है और यह एक आश्वर्य है। यह माना जाता है कि शारिरिक बल से इस त्रिशुल को हिलाया भी नहीं जा सकता, जबकि यदि कोई सच्चा भक्त इसे छू भी ले तो इसमें कम्पन होने लगता है।